काफी समय से इस पर हल्ला मचा हुआ है ,लेकिन वो शब्द जो भगवान से जुड़ा है क्या वो आतंकवाद से जुड़ सकता है ,भगवा तो प्रतीक है त्याग और बलिदान का फिर क्यो उसे आतंकवाद के साथ जोड़ा जा रहा है कुछ घटनाओ को आधार बनाकर हिन्दु संगठनो को बदनाम किया जा रहा है लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि हिन्दु ऐसा करने पर मजबूर क्यो हो रहा है देश की आज़ादी के साथ ही मुस्लिमो के लिए अलग देश के नाम पर पाकिस्तान बन गया लेकिन हिंदुव ने कभी अपने लिए अलग देश नही माँगा अल्पसंख्यको को दी जाने वाली रियायतो पर उसने कभी अंगुली नही उठाई ,
धीरे धीरे करके सारे उत्तर पूर्व से हिन्दु शब्द ही गायब हो गया पर वो चुप रहा , पंजाब मे उसे चलती बसो से उतारकर गोलियो से भूना गया पर उसने कही बदले मे ऐसा नही किया ,वोट क लालच मे असम,बंगाल,बिहार बंग्लादेशियो से भर दिए गये और अपने ही घर मे हिन्दु
अल्पसंख्यक बन गया पर वो चुप रहा ,उसने एक रात मे हजारो कश्मीरी पण्डित अपने घरो से खदेड़ कर तंबुओ मे रहने को मजबूर होते हुए देखे पर वो चुप रहा, अपने भगवान राम के मंदिर के लिए जगह माँगने पर उसने गोलियो से मरते हुए रामभक्तो को देखा पर वो चुप रहा ,लेकिन अब उसका वो दबा हुआ गुसा बाहर निकलने लगा था बाबरी विध्वंस क्यो हुआ ये मई नही जानता पर कही ना कही इसमे वो गुस्सा भी छिपा हुआ था लेकिन पहली बार उसने कुछ किया तो उसे चारो तरफ़ से गालिया मिलनी शुरू हो गयी ,पाकिस्तान और बंगलादेश मे सैकड़ो मंदिर तोड़ दिए गये ,देश मे आतंकवादी हमलो की बाढ़ सी आ गयी और इन सबका जिम्मेदार उसे माना गया ,अयोध्या से आती एक ट्रेन गोधरा मे जला दी गयी ,और उसकी वजह से जो दंगे हुए उसका जिम्मेदार भी हिन्दु रहा,लोग उसे सब कुछ कह्ते रहे लेकिन कोई उसके दिल मे छिपे दर्द को नही समझ पाया की कैसे अपने ही देश मे वो दोयम दर्जे का नागरिक हो गया है,कैसे देश क संसाधनो पर पहला हक अब उसका नही है उसकी हालत वो हो गयी है की सहा भी ना जाए और कुछ कहा भी ना जाए ,ऐसे मे अगर कुछ लोग ग़लत कदम उठाते है तो मेरा उनसे निवेदन है की उनके इन कदमो से हिन्दु समाज ही बदनाम होगा
Sunday, July 25, 2010
Tuesday, June 29, 2010
हमारा विकास
कभी कभी समझ नही आता की सरकार की बात माने या उसे सच मानू जो आज दिखाई दे रहा है हमारे देश मे अरबपतियो की संख्या दिन बा दिन बढ़ती जा रही है, विकास दर भी तेज़ी क साथ चकभी कभी समझ नही आता की सरकार की बात माने या उसे सच मानू जो आज दिखाई दे रहा है हमारे देश मे अरबपतियो की संख्या दिन बा दिन बढ़ती जा रही है, विकास दर भी तेज़ी क साथ चल रही है सारी दुनिया हमारी अर्थव्यवस्था को देख रही है ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ ठीक चल रहा हो लेकिन अचानक मेरा ध्यान कुछ खबरो की तरफ गया पता चला की हमारे देश मे ४७ करोड़ लोग ग़रीबी के रेखा से नीचे जी रहे हैं ,तभी ध्यान आया की दो महीने तक हमारे देश का एक र्राज्य मणिपुर आर्थिक नाकेबंदी मे रहा और हमारी सरकार देखती रही,देश की ३० करोड़ आबादी नक्सलियो के डर के साये मे जी रही है,एक ख़बर और आई की सरकार ने तेल की कीमतो को नियनतरण से मुक्त कर दिया है और महगाई का दानव ग़रीबो को निगलने के लिए मुह फैलाए खड़ा है ,तभी एक टीवी चैनल ने बताया की हमारे सांसदो की संपत्ति कितनी है ,हो भी क्यो ना अगर आप अरबपति हैं तो कोई भी पार्टी आपको राज्यसभा मे तो भेज ही देगी ,अब अरबपति आदमी ग़रीबो की क्या बात करेगा ये तो आप भी जानते हैं ल रही है सारी दुनिया हमारी अर्थव्यवस्था को देख रही है ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ ठीक चल रहा हो लेकिन अचानक मेरा ध्यान कुछ खबरो की तरफ गया पता चला की हमारे देश मे ४७ करोड़ लोग ग़रीबी के रेखा से नीचे जी रहे हैं ,तभी ध्यान आया की दो महीने तक हमारे देश का एक र्राज्य मणिपुर आर्थिक नाकेबंदी मे रहा और हमारी सरकार देखती रही,देश की ३० करोड़ आबादी नक्सलियो के डर के साये मे जी रही है,एक ख़बर और आई की सरकार ने तेल की कीमतो को नियनतरण से मुक्त कर दिया है और महगाई का दानव ग़रीबो को निगलने के लिए मुह फैलाए खड़ा है ,तभी एक टीवी चैनल ने बताया की हमारे सांसदो की संपत्ति कितनी है ,हो भी क्यो ना अगर आप अरबपति हैं तो कोई भी पार्टी आपको राज्यसभा मे तो भेज ही देगी ,अब अरबपति आदमी ग़रीबो की क्या बात करेगा ये तो आप भी जानते हैं और हमारी अर्थशास्त्री चौकड़ी ( मनमोहन,चिदंबरम,प्रणव मुखर्जी,अहलूवालिया) ये ना जाने कों सा गाणित लगाते रहते हैं की इन्हे बस विकास क अलावा कुछ दिखायीनही देता ना उजड़ते हुए गाव ना कटते हुए जंगल,ना महगाई से परेशान आम आदमी इन्हे तो बस वो विकास दर दिख रही है जो कितनी भी ऊँची हो जाए पर हमारे देस्श की ग़रीबी की रेख को नीचा नही कर सकती ,गाँधी जी कहते थे की असली भारत गाँव मे बस्ता है पर अब तो गाँवो को ही ख़त्म करने की त्यारी चल रही है समझ मे नही आ रहा ये विकास की दौड़ हमे कहा ले जायगीऔर हमारी अर्थशास्त्री चौकड़ी ( मनमोहन,चिदंबरम,प्रणव मुखर्जी,अहलूवालिया) ये ना जाने कों सा गाणित लगाते रहते हैं की इन्हे बस विकास क अलावा कुछ दिखायीनही देता ना उजड़ते हुए गाव ना कटते हुए जंगल,ना महगाई से परेशान आम आदमी इन्हे तो बस वो विकास दर दिख रही है जो कितनी भी ऊँची हो जाए पर हमारे देस्श की ग़रीबी की रेख को नीचा नही कर सकती ,गाँधी जी कहते थे की असली भारत गाँव मे बस्ता है पर अब तो गाँवो को ही ख़त्म करने की त्यारी चल रही है समझ मे नही आ रहा ये विकास की दौड़ हमे कहा ले जायगी
Sunday, May 23, 2010
जाति ना पूछो साधु की
कभी एक दोहा पढ़ा करते थे,जाति ना पूछो साधु की लेकिन स्कूल मे अध्यापक और दोस्तो के घर पर उनके घर वाले पूछ ही लेते थे बेटा तुम्हारी जाति क्या है,वरना पूरा नाम ही पूछ लेते थे बाद मे समझ मे आया की की हमारा पूरा नाम ही तो हमारी जाति बताता है मंडल कमंडल का दौर आया तो कभी धर्म जाति पर तो कभी जाति धर्म पर भारी पड़ने लगे अचानक पिछड़ो को अपनी ताक़त का अहसास होने लगा मुलायम और लालू जैसे समाजवादी अचानक जातियो के दम पर बड़े नेता बन गये लेकिन कमण्डल के जादू ने इन्हे कभी इनके प्रदेशो से बाहर नही निकालने दिया तो इन्होने भी अपराजेय बन रहे कमण्डल को रोके रखा ,उत्तर प्रदेश मे तो पिछड़ो का नेतरत्व पूरी तरह से कल्याण और मुलायम के बीच बँट गया ,धीरेधीरे कमंडल की चमक फीकी पड़ती चली गयी और पिछड़े भी अब यादव ,कुर्मी,लोध,कुम्हार ,जाट मे बँटते चले गये ,आरक्षण पिछड़ो को तो मिला पर उसका लाभ सिर्फ़ उन्ही जातियो को मिल पाया जिनके नेता सत्ता मे थे और बाकी जातिया पिछड़ी की पिछड़ी ही रह गयी हर जाति अपनी गिनती बढ़ा चढ़कर बताती है इस जनगणना के बाद सबकी गिनती भी पता चल जाएगी ,चाहे बात अनुसूचित जातियो के आरक्षण की बात हो या पिछड़ी जातियो के उसका लाभ सिर्फ़ कुछ ही जातियो को मिल पाया आज भी एक बड़ा तबका पिछड़ा ही है अगर जाति के आधार पर जनगणना की बात हो रही है तो क्यो हो हल्ला मचाया जा रहा है इससे कम से कम हर जाति की संख्या और उसकी आरक्षण मे भागीदारी भी पता चल जाएगी ,जो जातिया आरक्षण के लिए बात बात पर सड़को पर उतर आते हैं उनको आरक्षण की ज़रूरत भी पता चल जाएगी
Saturday, May 1, 2010
ग़रीबो की सुनो
कभी सपेरो,जादुगरो का देश कहा जाने वाला भारत आज विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है,जहा लाखो की सैलरी पाने वाला
एक बड़ा वर्ग है ,बड़े बड़े शॉपिंग माल हैं,मल्टीप्लेक्स हैं,महँगी गाड़ियाँ हैं , बड़ी बड़ी पार्टियाँ जिनमे लाखो रुपये की शराब बहायी जाती है,कुल मिलाकर हर वो सुविधा है जो कभी पश्चिम के देशो मे हम देखा करते थे मतलव ये कि हमारा भारत भी अब विकसित देश बनने जा रहा है माफ कीजिये ये हमारा भारत नही ये तो कुछ फीसदी लोगों का चमचमाता इंडिया है हमारा भारत तो आज भी उसी हालात मे है बल्कि शायद उससे भी बदतर पहले हम कम कमाते थे पर चैन से रहते थे कही किसानो की ज़मीन नही छीनी जाती थी ,ग़रीबी की रेखा से नीचे जीने वाले लोग भी कम से कम जी तो लेते थे ,सरकार भी ग़रीबो के दम पर और ग़रीबो के लिए सोचने वाली होती थी अब ग़रीबो के लिए सोचने का वक़्त ही नही किसी के पास, बड़ी औध्योगिक इकाइयो के लिए ज़मीन से लेकर हर सुविधाए मुहैया कराई जा रही हैं जनता के चुने हुये नुमाईन्दो के लिये जनता कि कमायी पानी कि तरह बहायी जा सकती है पर ग़रीबो को कुछ किलो ज़्यादा राशन देना सरकार का बजट बिगाड़ सकता है , मध्यम वर्ग की कमर तोड़ने वाले कर लगाए जा सकते हैं मगर करोड़ो अरबो रुपये के खेल वाले आई पी एल से आप वसूली नही कर सकते,अगर ये सब ऐसे ही चलता रहा तो वो दिन दूर नही जब हमारा भारत और कुछ लोगो के इंडिया के बीच का फ़र्क इतना बढ़ जाएगा जिसे दूर करना असंभव होगा
एक बड़ा वर्ग है ,बड़े बड़े शॉपिंग माल हैं,मल्टीप्लेक्स हैं,महँगी गाड़ियाँ हैं , बड़ी बड़ी पार्टियाँ जिनमे लाखो रुपये की शराब बहायी जाती है,कुल मिलाकर हर वो सुविधा है जो कभी पश्चिम के देशो मे हम देखा करते थे मतलव ये कि हमारा भारत भी अब विकसित देश बनने जा रहा है माफ कीजिये ये हमारा भारत नही ये तो कुछ फीसदी लोगों का चमचमाता इंडिया है हमारा भारत तो आज भी उसी हालात मे है बल्कि शायद उससे भी बदतर पहले हम कम कमाते थे पर चैन से रहते थे कही किसानो की ज़मीन नही छीनी जाती थी ,ग़रीबी की रेखा से नीचे जीने वाले लोग भी कम से कम जी तो लेते थे ,सरकार भी ग़रीबो के दम पर और ग़रीबो के लिए सोचने वाली होती थी अब ग़रीबो के लिए सोचने का वक़्त ही नही किसी के पास, बड़ी औध्योगिक इकाइयो के लिए ज़मीन से लेकर हर सुविधाए मुहैया कराई जा रही हैं जनता के चुने हुये नुमाईन्दो के लिये जनता कि कमायी पानी कि तरह बहायी जा सकती है पर ग़रीबो को कुछ किलो ज़्यादा राशन देना सरकार का बजट बिगाड़ सकता है , मध्यम वर्ग की कमर तोड़ने वाले कर लगाए जा सकते हैं मगर करोड़ो अरबो रुपये के खेल वाले आई पी एल से आप वसूली नही कर सकते,अगर ये सब ऐसे ही चलता रहा तो वो दिन दूर नही जब हमारा भारत और कुछ लोगो के इंडिया के बीच का फ़र्क इतना बढ़ जाएगा जिसे दूर करना असंभव होगा
Thursday, April 29, 2010
नक्सलवाद का दंश
नक्सल वाद पर आज एक बहस का दौर चल निकला है समर्थक जहा इसे ग़रीबो आदिवासीयो और शोषित वर्ग के हितो की लड़ाई बता रहे हैं वही विरोधी इसे देश के विरुध एक युध्ह बता रहे हैं लेकिन दोनो मे से कोई भी सच समझने को तय्यार नही है नक्सल वाद के समर्थक ये क्यो भूल जाते हैं जिन लोगो का देश के लोकतंत्र मे कोई विश्वास नही है ,जिनका मकसद सिर्फ़ बंदूक के दम पर सत्ता परिवर्तन करना है जो लोग बाते तो ग़रीबो और शोषित वर्ग की करते हैं लेकिन खुद उनके पढ़ने के लिए बनाए गये स्कूलो को बम से उड़ा देते हैं,ना वाहा सड़के बनाने देते हैं ना रोज़गार के लिए किसी योजना को चलने देते हैं ना उन ग़रीबो तक स्वास्थ सेवाए पहुचने देते हैं वो बात ग़रीबो की नही करते वो तो चाहते हैं की ये ग़रीबी और ये पिछड़ापन बना रहे ताकि इनकी समान्तर सता चलती रहे अगर ये ग़रीबो के हितैषी ही हैं तो कैसे झारखंड मे (जहा ये इतनी ताक़त मे हैं की विधायक से लेकर सांसद तक को मार देते हैं)ग़रीबो के पैसे को नेताओ ने अपनी मर्ज़ी से लूटाया लेकिन इनकी दुश्मनी उनसे नही क्योकि वो तो इन्हे पैसा खिलाते रहे और खुद खाते रहे इनकी दुश्मनी को उन जवानो से है जो देश के लिए लड़ने की कसम खाते हैं फिर चाहे उन्हे किसी से भी लड़ना पड़े ,अपने आप को शोषित वर्ग की आवा ज कहने वाले ये सिर्फ़ समाज विरोधी हैं ,और एक तरफ हैं नक्सल वाद के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की माँग करने वाले ये सही है की इन पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन क्या जिन माँगो के लिए ये लोग अपनी लड़ाई को जायज़ ठहरा रहे हैं उसके बारे मे सोचा जा रहा है क्यो बड़ी औध्योगिक परियोजनाओ के नाम पर आदिवासीयो और किसानो को उजाड़ा जा रहा है अगर ये सब कुछ विकास के नाम पर हो रहा है तो क्यो देश मे ३७% लोग आज ग़रीबी की रेखा से नीचे पहुच गये ,देश की नितिनिर्माताओ को सोचना चहाइए की उनकी नीतिया देश ई ९०% आबादी के लिए हैं या सिर्फ़ १०% लोगो के लिए .
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