Monday, August 22, 2011

अरेंज मॅरिज

एक दिन एक ब्लॉग पढ़ रहा था उसमे अरेंज मॅरिज को अरेंज करने की कुछ परेशानियो के बारे मे पढ़ रहा था लेखिका ने अपने लेख मे एक लड़की के पिता को अपनी बेटी के लिए योग्य वर खोजतेसमय की कुछ बातो का बड़ी अच्छी तरह से ज़िक्र किया ,लेकिन कुछ बाते ऐसी हैं जहा हम पूर्वाग्रहो से ग्रस्त होते हैं जहा लड़किया ये मानकर चलती हैं की उनका होने वाला जीवन साथी का पिछला जीवन सॉफ सुथरा हो ,वो अच्छा पढ़ा लिखा हो अच्छा कमाता हो ,देखने मे अच्छा हो ,वही लड़के भी चाहते हैं की आज के माहॉल के हिसाब से लड़की इतनी सुंदर हो की लोग बस देखते रह जाएँ ,पिछला रेकॉर्ड उसका बिल्कुल सॉफ हो अच्छी पढ़ी लिखी हो अगर नौकरी भी हो तो और अच्छा वरना लड़की के पिताजी तो देंगेही अपनी बेटी के लिए,इस तरह की सोच दोनो तरफ है हम आजकल अरेंज मेरिज कहते ज़रूर हैं पर हम ये सब जानते हैं की अब अरेंज मेरिज
कितनी प्रॅक्टिकल हो गयी है,लड़का और लड़की दोनो एक दूरे को अपनी उस योग्यता सूची से मिलातेहैं जो उन्होने अपने जीवन साथी के लिए बना रखी है
बस फ़र्क ये होता है की लवमैरिज की तरह लड़के लड़की एक दूसरे को उतना नही जानते, मॅआज भी ये सुनता हूँ
की कही किसी लड़की के लिए अच्छा लड़का नही मिल पा रहा तो कही किसी
लड़के के लिए अच्छी लड़की नही मिल पा रही ,हमने रिश्तो की परिभाषए बदल दी हैं,आज हम पति या पत्नी नही खोजते हम चाहते हैं हमे कोई ऐसा मिले जो हमारी उन इच्छाओ को पूरा करने मे हमारी मदद करे जो हम अकेले नही कर सकते,

Sunday, October 31, 2010

फ़िल्मे-समाज का आईना

एक दिन राजकपूर की एक फिल्म देख रहा था जिसमे एक सीधा साधा नौजवान बी ए की डिग्री जेब मे रखे हुए नौकरी की तलाश मे घूमता है,फुटपाथ पर सोने वालो और झुग्गी झोपड़ी मे रहने वालो के साथ रहता है उनके पास रहना खाने के लिए कुछ अच्छा हो या ना हो पर एक दूसरे के गम बाँटने के लिए एक अच्छा दिल ज़रूर होता है ,फिल्म मे उस ग़रीब भारत की तस्वीर भी दिखाई देती है जिसे अब देखना नही चाहते और समाज का आईना कही जाने वाली फ़िल्मे उसे दिखाना पसंद नही करती,हीरो एक लड़की से मिलता है कुछ ना होते हुए सिर्फ़ अपनी बातो से लड़की को इंप्रेस करना चाहता है उसे बताता है की वो आवारा तो है पर अनपड़ नही ,लड़की उसे पसंद करने लगती है ,हीरो उसे फुटपाथ पर चाय पिलाता है जिसके पैसे भी लड़की ही देती है और दोनो अपने प्यार को स्वीकार करते हैं ,हीरो अमीर बनने के लिए धोखाधड़ी के तरीके अपनाता है पैसा कमाता है पर वो प्यार नही पा पाता और अंत मे वापस सब कुछ छोड़ कर वही सीधा साधा नौजवान बनकर जाने लगता है तो उसका प्यार उसे अपनाता है औ कहानी का अंत हो जाता है कुल मिलाकर एक ग़रीब भारत का ग़रीब हीरो जो उसी हिन्दुस्तान का प्रतिनिधि है जो असलियत मे है फिल्म एक आम आदमी की कहानी दिखती है जहा ग़रीबी है पर लोगो के बीच एक अपनापन है एक दूसरे के दर्द समझने का अहसास है ,दूसरी तरफ देखता हू तो आज की फ़िल्मे हैं जहा हीरो हेरोइन करोड़पति होते हैं फ़िल्मो मे होता है तो उनका रोमांस बस उन्हे इस समाज से कोई मतलब ही नही होता आज हीरो या तो एक दबंग पुलिस वाला होता है जिसे सिस्टम से कोई मतलब नही सही ग़लत का फ़ैसला वो खुद करता है,या किसी अरबपति परिवार का लड़का जिसे किस चीज़ की कोई चिंता ही नही होती,या एक बड़ा अपराहदी जो कन्नों तोड़ता है लेकिन उसका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता ,हीरोइन भी अब वो सुंदर और सुशील वाला चोला उतार चुकी है अब लड़की का सेक्सी,स्टाइलिश होना ज़रूरी है वो पुरानी फ़िल्मो की संस्कारवान्न लड़की तो अब पर्दे से गायब हो चुकी है फ़िल्मे अब करोड़ो का नही अरबो का कारोबार करती हैं लेकिन क्या वो उस समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसके लिए उन्हे बनाया जाता है शायद नहियब वो दिन पुराने हो गये जब फ़िल्मे समाज का आईना हुआ करती थी